11/4/16

मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना//Mukesh

मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना
, mere man ki ganga aur tere man ki jamuna ka,
 mukesh, 
sangam, 
                     SONG 
मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का
बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं

अरे बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं
नहीं, कभी नहीं!



कितनी सदियाँ बीत गईं हैं
हाय तुझे समझाने में
मेरे जैसा धीरज वाला है कोई और ज़माने में
मन का बढ़ता बोझ कभी कम होगा की नहीं
बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं
जा जा!


दो नदियों का मेल अगर इतना पावन कहलाता है
क्यों न जहाँ दो दिल मिलते हैं, स्वर्ग वहाँ बस जाता है
पत्थर पिघले दिले तेरा नम होगा की नहीं
बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं
उँह


तेरी ख़ातिर मैं तरसा यूँ जैसे धरती सावन को
राधा राधा एक रटन है साँस की आवन जावन को
हर मौसम है प्यार का मौसम होगा की नहीं
बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं
जाओ न क्यों सताते हो! होगा, होगा, होगा!


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